परिसीमन विधेयक और भारतीय राजनीतिक-आर्थिक संरचना पर इसके व्यापक प्रभाव: एक विस्तृत शोध रिपोर्ट

 परिसीमन विधेयक और भारतीय राजनीतिक-आर्थिक संरचना पर इसके व्यापक प्रभाव: एक विस्तृत शोध रिपोर्ट

प्रस्तावना

किसी भी परिपक्व और विकासशील लोकतंत्र में, प्रतिनिधित्व की समान और आनुपातिक व्यवस्था उसकी वैधता, स्थिरता और सुशासन का मूल आधार होती है। "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" (One person, one vote, one value) का लोकतांत्रिक और संवैधानिक सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि संसद या राज्य विधानसभाओं में निर्वाचित जनप्रतिनिधि लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करें। इस वैधानिक और भौगोलिक समतुल्यता को धरातल पर उतारने की निरंतर प्रक्रिया को 'परिसीमन' (Delimitation) कहा जाता है। भारत जैसे विशाल, अत्यधिक विविधतापूर्ण और जटिल संघीय ढांचे वाले देश में, परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाओं को फिर से खींचने की एक तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया मात्र नहीं है। इसके विपरीत, यह एक अत्यंत जटिल, दूरगामी और राजनीतिक रूप से संवेदनशील कवायद है, जो यह तय करती है कि देश की सत्ता का भावी संतुलन किन राज्यों, क्षेत्रों और जनसांख्यिकीय समूहों की ओर झुकेगा।


भारतीय संविधान के लागू होने के बाद के प्रारंभिक दशकों में, परिसीमन की प्रक्रिया हर दशकीय जनगणना के बाद नियमित रूप से संपन्न होती रही, लेकिन 1970 के दशक में राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण (परिवार नियोजन) के प्रयासों को गति देने के उद्देश्य से इसे राजनीतिक रूप से स्थगित (Freeze) कर दिया गया। वर्तमान में भारतीय संसद (लोकसभा) और राज्य विधानसभाओं की कुल सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर ही आधारित है, जबकि यह संवैधानिक रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक प्रभावी है।


हाल ही के घटनाक्रमों ने इस लंबे समय से सुप्त मुद्दे को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। अप्रैल 2026 में बुलाए गए संसद के एक विशेष सत्र में केंद्र सरकार द्वारा 'संविधान (131वां संशोधन) विधेयक' और 'परिसीमन विधेयक 2026' पेश किया गया। यद्यपि यह संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा (विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े), लेकिन इस विधायी प्रयास ने भविष्य के परिसीमन के स्वरूप और इससे भारतीय राजनीति में होने वाले संरचनात्मक बदलावों का एक स्पष्ट और विस्तृत खाका देश के सामने प्रस्तुत कर दिया है।

यह विस्तृत शोध रिपोर्ट इस बात का अत्यंत गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है कि यदि परिसीमन विधेयक (और संबंधित संविधान संशोधन) भविष्य में पारित होकर लागू होता है, तो भारतीय लोकतंत्र, इसके संघीय संतुलन, राजनीतिक शक्ति के वितरण, राजकोषीय संघवाद की नीतियों और जनसांख्यिकीय प्रतिनिधित्व में क्या-क्या बुनियादी और दूरगामी बदलाव (What will change) आएंगे।

संवैधानिक ढांचा, वैधानिक प्रावधान और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत में परिसीमन के भावी प्रभावों को पूरी तरह से समझने के लिए, इसके संवैधानिक आधार और ऐतिहासिक विकास-क्रम का सूक्ष्म अवलोकन आवश्यक है। भारतीय संविधान के कई महत्वपूर्ण अनुच्छेद परिसीमन की प्रक्रिया और उसके कार्यान्वयन को दिशा-निर्देशित करते हैं।

संवैधानिक आधार और संस्थागत संरचना

संविधान का अनुच्छेद 81 यह अनिवार्य करता है कि लोकसभा में प्रत्येक राज्य को उसकी कुल जनसंख्या के आनुपातिक रूप में सीटें आवंटित की जाएं। इसके साथ ही, अनुच्छेद 82 यह प्रावधान करता है कि प्रत्येक दशकीय जनगणना के पूरा होने के बाद, राज्यों को लोकसभा में सीटों का आवंटन और प्रत्येक राज्य के भीतर प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों का विभाजन संसद द्वारा निर्मित कानून (Delimitation Act) के तहत किया जाएगा। इसी प्रकार, अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं के लिए समान आनुपातिक समायोजन और परिसीमन का प्रावधान करता है, जिसमें प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रकार विभाजित किया जाता है कि जनसंख्या और सीटों का अनुपात पूरे राज्य में एक समान रहे।


इस संपूर्ण प्रक्रिया को निष्पक्ष रूप से संचालित करने के लिए संसद ने परिसीमन आयोग अधिनियम (Delimitation Commission Act) पारित किया है। परिसीमन आयोग एक वैधानिक (Statutory) और अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) निकाय है। इस आयोग की संरचना इस प्रकार की गई है कि यह राजनीतिक हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त रहे। इसके अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त या सेवारत न्यायाधीश होते हैं, जबकि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) और संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त इसके पदेन सदस्य होते हैं।


संविधान का अनुच्छेद 327 संसद को चुनाव संबंधी कानून बनाने की व्यापक शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 329(a) परिसीमन आयोग के आदेशों को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर रखता है। इसका अर्थ यह है कि परिसीमन आयोग द्वारा जारी किए गए आदेश, जब भारत के राजपत्र (Gazette of India) में प्रकाशित हो जाते हैं, तो वे कानून के समान बाध्यकारी होते हैं और उन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। यह संवैधानिक कवच इसलिए प्रदान किया गया है ताकि अनिश्चितकालीन कानूनी विवादों के कारण देश की चुनाव प्रक्रिया बाधित न हो। इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 क्रमशः लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए उनकी नवीनतम जनसंख्या के अनुपात में सीटों के आरक्षण की वैधानिक व्यवस्था करते हैं।

सीटों का स्थगन (The Freeze) और जनसांख्यिकीय विचलन का उदय

संविधान निर्माताओं की मूल परिकल्पना यह थी कि हर जनगणना के बाद सीटों का पुनर्वितरण स्वाभाविक रूप से होगा। इस परिकल्पना को साकार करने के लिए 1952, 1962 और 1972 के परिसीमन अधिनियमों के तहत यह अभ्यास किया भी गया। 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा की सीटें 543 तय की गईं, जब देश की कुल जनसंख्या 54.8 करोड़ थी। उस समय देश भर में प्रति सांसद औसतन 10.1 लाख की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व था।


हालाँकि, 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से तत्कालीन सरकार ने परिसीमन और सीटों के पुनर्निर्धारण पर वर्ष 2001 तक के लिए रोक (Freeze) लगा दी। इस अप्रत्याशित कदम का प्राथमिक उद्देश्य उन राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित होने से बचाना था (विशेषकर दक्षिणी राज्य), जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया था। यदि परिसीमन होता रहता, तो कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटें कम हो जातीं।


वर्ष 2001 में, जब इस रोक की अवधि समाप्त होने वाली थी, तब 84वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस रोक को अगले 25 वर्षों, यानी 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक के लिए और बढ़ा दिया गया। इसके बाद, 2003 में पारित 87वें संशोधन ने केवल इतना परिवर्तन किया कि राज्यों की कुल लोकसभा या विधानसभा सीटों की संख्या में कोई बदलाव किए बिना, 2001 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर राज्यों के भीतर की भौगोलिक सीमाओं (Intra-state boundaries) का पुनर्गठन करने की अनुमति दे दी। यह आंतरिक परिसीमन प्रक्रिया 2008 में लागू हुई।


परिणामस्वरूप, पिछले पाँच दशकों में भारत की जनसंख्या में लगभग एक अरब की भारी वृद्धि हुई है, लेकिन देश का राजनीतिक और विधायी मानचित्र लगभग अपरिवर्तित है। इस जनसांख्यिकीय विचलन (Demographic divergence) ने देश में प्रतिनिधित्व का एक गहरा संकट पैदा कर दिया है। आज स्थिति यह है कि बिहार का एक सांसद औसतन 3.1 मिलियन नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि केरल का एक सांसद औसतन 1.75 मिलियन नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है। यह स्थिति "एक व्यक्ति, एक वोट" के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है, जहाँ दक्षिणी राज्यों के मतदाताओं के वोट का मूल्य उत्तरी राज्यों के मतदाताओं की तुलना में बहुत अधिक हो गया है।

परिसीमन विधेयक 2026 और विधायी प्रस्ताव

इसी कु-विभाजन (Malapportionment) को संबोधित करने के उद्देश्य से अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार द्वारा 'संविधान (131वां संशोधन) विधेयक' और 'परिसीमन विधेयक 2026' संसद में प्रस्तुत किया गया। यदि ये विधेयक भविष्य में पारित होकर अधिनियम बनते हैं, तो व्यवस्था में निम्नलिखित मूलभूत परिवर्तन होंगे:


पहला परिवर्तन समय-सीमा और आधार जनगणना से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना (जो संभवतः 2031 में होगी) के आधिकारिक आंकड़े प्रकाशित होने तक सीटों का परिसीमन नहीं किया जा सकता था। 131वें संशोधन विधेयक ने इस शर्त (Proviso) को हटाने का प्रस्ताव रखा, जिससे संसद को यह अधिकार मिल जाता कि वह साधारण बहुमत से कानून बनाकर यह तय कर सके कि परिसीमन कब किया जाएगा और इसके लिए किस जनगणना (जैसे 2011 या नवीनतम उपलब्ध आंकड़े) का उपयोग किया जाएगा।


दूसरा बड़ा परिवर्तन लोकसभा के आकार में अभूतपूर्व वृद्धि का प्रस्ताव था। विधेयक में लोकसभा की अधिकतम संवैधानिक सदस्य संख्या को 550 (राज्यों से 530 और केंद्र शासित प्रदेशों से 20) से बढ़ाकर अधिकतम 850 (राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35) करने का प्रावधान शामिल था।

तीसरा परिवर्तन 106वें संविधान संशोधन (नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023) के कार्यान्वयन से जुड़ा था। महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को लागू करने की शर्त परिसीमन से जुड़ी हुई थी (अनुच्छेद 334A)। परिसीमन को 2026 के बाद की जनगणना से अलग (Uncouple) करके, यह नया विधेयक महिला आरक्षण को अगले ही राष्ट्रीय चुनाव चक्र (2029) से लागू करने का कानूनी रास्ता साफ करता था।


संसद में इस विधेयक पर हुई बहस ने भावी परिसीमन के कारण उत्पन्न होने वाले राजनीतिक तनावों को उजागर कर दिया। तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह ने विधेयक का बचाव करते हुए तर्क दिया कि परिसीमन का विरोध करने वाले लोग वस्तुतः अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की सीटों में वृद्धि का विरोध कर रहे हैं, और जोर देकर कहा कि विस्तारित सदन में भी दक्षिणी राज्यों के सांसदों को उत्तरी राज्यों के सांसदों के समान ही अधिकार प्राप्त होंगे। इसके विपरीत, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस विधेयक को सरकार की एक "घबराहट भरी प्रतिक्रिया" (Panic reaction) बताया, जिसका महिलाओं के आरक्षण से कम और भारत के चुनावी मानचित्र को बदलकर दक्षिणी, पूर्वोत्तर और छोटे राज्यों का प्रतिनिधित्व छीनने से अधिक लेना-देना था। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इसे "राजनीतिक नोटबंदी" (Political demonetisation) करार दिया, जो बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के लाया गया था।

यद्यपि यह विशेष विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में गिर गया, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया है कि भविष्य में जब भी परिसीमन लागू होगा, तो वह भारतीय राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था में कई संरचनात्मक बदलाव लाएगा। इन बदलावों का विस्तृत विश्लेषण नीचे प्रस्तुत किया गया है।

बदलाव 1: लोकसभा में राजनीतिक शक्ति का पुनर्वितरण और उत्तर-दक्षिण विभाजन

परिसीमन का सबसे गहरा, स्पष्ट और दूरगामी प्रभाव भारत की राजनीतिक शक्ति के समग्र संतुलन पर पड़ेगा। भारत के विभिन्न राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की दरें बेहद असमान रही हैं। 1971 से अब तक जनसांख्यिकीय आंकड़े बताते हैं कि बिहार की जनसंख्या में लगभग 215% की भारी वृद्धि हुई है, जबकि इसके विपरीत केरल की जनसंख्या में केवल 70% की वृद्धि दर्ज की गई है।


यदि अनुच्छेद 81 के "जनसंख्या के अनुपात" वाले नियम को भविष्य में सख्ती से लागू किया जाता है, तो तीव्र गति से बढ़ने वाले और अपेक्षाकृत गरीब उत्तरी राज्य (हिन्दी पट्टी) लोकसभा में भारी अतिरिक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त करेंगे, जबकि धीमी गति से बढ़ने वाले, आर्थिक रूप से समृद्ध दक्षिणी राज्यों के सापेक्ष राजनीतिक प्रभाव में भारी और अभूतपूर्व गिरावट आएगी।

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस (Carnegie Endowment for International Peace) के शोधकर्ताओं, मिलन वैष्णव और जेमी हिंटसन (Milan Vaishnav and Jamie Hintson), के गहन अकादमिक विश्लेषण और 'वेबस्टर फॉर्मूले' (Webster's method) के उपयोग से भविष्य के परिसीमन के दो स्पष्ट परिदृश्य सामने आते हैं। वेबस्टर फॉर्मूला आनुपातिक सीटों की गणना का एक निष्पक्ष और प्रमाणित गणितीय तरीका है, जिसमें सदन की कुल सीटों को कुल जनसंख्या से विभाजित करके एक 'भाजक' (Divisor) निकाला जाता है, और फिर प्रत्येक राज्य की जनसंख्या को उस भाजक से भाग देकर सीटें आवंटित की जाती हैं।

परिदृश्य A: लोकसभा की कुल सीटें 543 ही रखी जाएं

यदि सरकार लोकसभा की अधिकतम सीटों को वर्तमान 543 पर ही बरकरार रखती है और 2026 की अनुमानित जनसंख्या के आधार पर उनका पुनर्वितरण (Re-apportionment) करती है, तो राजनीतिक शक्ति में भारी भूकंप आएगा। इस परिदृश्य में, उत्तरी राज्यों के समूह (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) को सामूहिक रूप से 22 अतिरिक्त सीटें प्राप्त होंगी। इसके विपरीत, चार प्रमुख दक्षिणी राज्यों (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु) को सामूहिक रूप से 17 सीटों का सीधा नुकसान उठाना पड़ेगा। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश को अपनी वर्तमान 80 सीटों की तुलना में 91 सीटें मिलेंगी, जबकि तमिलनाडु 39 से घटकर 31 सीटों पर आ जाएगा।


यह परिदृश्य भारत के संघीय ढांचे के लिए इतना विस्फोटक है कि कोई भी समझदार केंद्र सरकार दक्षिणी राज्यों की पूर्ण सहमति के बिना इसे लागू करने का जोखिम नहीं उठा सकती, क्योंकि यह सीधे तौर पर अलगाववाद या गहरे क्षेत्रीय असंतोष को जन्म दे सकता है।

परिदृश्य B: लोकसभा का आकार बढ़ाकर 850 किया जाए

विवाद और दक्षिणी राज्यों के सीधे नुकसान से बचने के लिए, 131वें संशोधन विधेयक में लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने का जो प्रस्ताव रखा गया था, वह एक रणनीतिक कदम था ताकि किसी भी राज्य की पूर्ण सीटों (Absolute numbers) में कमी न आए। स्वतंत्र विश्लेषकों (जैसे योगेंद्र यादव) तथा द हिंदू (The Hindu) की डेटा पत्रकारिता के अनुसार, 815-850 सीटों वाले नए विस्तारित सदन में प्रतिनिधित्व का परिदृश्य कुछ इस प्रकार होगा:

राज्य

वर्तमान सीटें (1971 के आधार पर)

प्रस्तावित/अनुमानित सीटें (850 सीटों वाले बड़े सदन में)

पूर्ण वृद्धि (Absolute Gain)

543 सदस्यीय सदन में वर्तमान हिस्सेदारी (%)

850 सदस्यीय सदन में नई हिस्सेदारी (%)

उत्तर प्रदेश

80

138

+58

14.73%

16.24% (वृद्धि)

बिहार

40

72

+32

7.37%

8.47% (वृद्धि)

महाराष्ट्र

48

78

+30

8.83%

~9.50% (वृद्धि)

तमिलनाडु

39

50

+11

7.18%

5.88% (कमी)

केरल

20

23

+3

3.68%

2.70% (कमी)


यद्यपि उपरोक्त तालिका देखने में ऐसा प्रतीत कराती है कि सभी राज्यों को लाभ हो रहा है (चूंकि किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं हो रही हैं), लेकिन इसका वास्तविक राजनीतिक निहितार्थ बहुत गहरा है। परिसीमन का यह मॉडल यह सुनिश्चित करता है कि भले ही लोकसभा का आकार बढ़ा दिया जाए और केरल तथा तमिलनाडु को क्रमशः 3 और 11 अतिरिक्त सीटें मिल जाएं, लेकिन सदन के संपूर्ण स्वरूप के भीतर उनकी सापेक्ष शक्ति (Relative Power) और भी अधिक सिकुड़ जाएगी।

योगेंद्र यादव के विश्लेषण के अनुसार, यदि केरल का वर्तमान आनुपातिक हिस्सा बरकरार रखा जाता, तो 850 सीटों वाले सदन में उसे 31 सीटें मिलनी चाहिए थीं, लेकिन परिसीमन के बाद उसे केवल 23 सीटें मिलेंगी। इसका अर्थ है कि उसे अप्रत्यक्ष रूप से 8 सीटों का भारी नुकसान हो रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश को आनुपातिक रूप से 125 सीटें मिलनी चाहिए थीं, लेकिन वह 138 सीटें प्राप्त करेगा, जो 13 सीटों का शुद्ध लाभ है।


कुल मिलाकर, हिन्दी भाषी क्षेत्र (Hindi Heartland) का लोकसभा में हिस्सा वर्तमान 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाएगा, जबकि दक्षिणी राज्यों का सामूहिक हिस्सा 24.3% से घटकर मात्र 20.7% रह जाएगा।


इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक परिणाम यह होगा कि भविष्य में कोई भी राजनीतिक दल या गठबंधन केवल उत्तरी, मध्य और पश्चिमी भारत में चुनावी सफलता हासिल करके केंद्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने में सक्षम हो जाएगा। दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर राज्यों, और कम जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों (जैसे पंजाब, हिमाचल प्रदेश) की केंद्र सरकार के गठन और राष्ट्रीय नीति-निर्माण में प्रासंगिकता तथा सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining power) में भारी कमी आएगी। यह स्थिति भारतीय संघवाद के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती प्रस्तुत करती है, क्योंकि दक्षिणी राज्यों में यह धारणा पहले ही बहुत गहरी हो चुकी है कि उन्हें शिक्षा, परिवार नियोजन, और मानव विकास सूचकांकों में राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने की सजा दी जा रही है।

बदलाव 2: संसदीय कार्यप्रणाली और द्विसदनीय संतुलन का विस्थापन

परिसीमन की प्रक्रिया केवल लोकसभा की आंतरिक संरचना को ही नहीं बदलेगी, बल्कि यह भारत के द्विसदनीय (Bicameral) संसदीय ढांचे के नाजुक संतुलन को भी पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर देगी।


संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राज्यसभा (Council of States) में अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं। 131वें संविधान संशोधन विधेयक ने राज्यसभा की इस सदस्य संख्या को अपरिवर्तित छोड़ दिया था। वर्तमान में, लोकसभा (543) और राज्यसभा (245) की शक्ति का अनुपात लगभग 2.2:1 है, जो विधायी प्रक्रिया में दोनों सदनों के बीच एक व्यावहारिक संतुलन बनाए रखता है।


यदि लोकसभा की सदस्य संख्या 50% से अधिक बढ़ाकर 850 कर दी जाती है और राज्यसभा 250 पर ही स्थिर रहती है, तो यह अनुपात बदलकर 3.3:1 हो जाएगा। इस परिवर्तन के कई गंभीर संवैधानिक और प्रक्रियात्मक परिणाम होंगे:


पहला बड़ा प्रभाव संयुक्त अधिवेशनों (Joint Sittings) में राज्यसभा की पूर्ण अप्रासंगिकता के रूप में सामने आएगा। संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत, जब किसी सामान्य विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गहरा मतभेद होता है, या एक सदन द्वारा पारित विधेयक को दूसरा सदन अस्वीकार कर देता है, तो गतिरोध को हल करने के लिए राष्ट्रपति संयुक्त अधिवेशन बुलाते हैं। यदि लोकसभा का आकार 850 हो जाता है, तो केंद्र सरकार (जिसके पास लोकसभा में साधारण बहुमत होगा) राज्यसभा के किसी भी विरोध को आसानी से संख्याबल से कुचल सकेगी। उदाहरण के लिए, यदि किसी विवादास्पद विधेयक पर विपक्ष के पास राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत भी हो, लेकिन सरकार के पास लोकसभा में 56% सीटें हों, तो सरकार किसी भी संयुक्त अधिवेशन में वह विधेयक आसानी से पारित करा लेगी। यह स्थिति राज्यसभा की संघीय जांच और संतुलन (Checks and Balances) की उस संवैधानिक भूमिका को लगभग समाप्त कर देगी जिसके लिए उसे राज्यों की परिषद के रूप में स्थापित किया गया था।


दूसरा महत्वपूर्ण प्रभाव राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों पर पड़ेगा। भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव एक इलेक्टोरल कॉलेज द्वारा किया जाता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। लोकसभा का आकार बहुत अधिक बढ़ने से इन चुनावों में राज्यसभा सदस्यों (जो राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं) के वोटों का सापेक्षिक महत्व (Relative share) काफी कम हो जाएगा, जिससे राष्ट्रपति चुनाव पूरी तरह से लोकसभा के जनादेश पर निर्भर हो जाएगा।


तीसरा बड़ा बदलाव कार्यपालिका (केंद्रीय मंत्रिपरिषद) के अत्यधिक विस्तार के रूप में दिखेगा। संविधान के अनुच्छेद 75 में, जिसे 2003 के 91वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था, यह स्पष्ट प्रावधान है कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकता। यह सीमा इसलिए लगाई गई थी क्योंकि तत्कालीन सरकारें राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए 'जंबो कैबिनेट' बना रही थीं। वर्तमान 543 सदस्यों वाली लोकसभा के आधार पर अधिकतम 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। परंतु यदि लोकसभा की क्षमता 815-850 हो जाती है, तो मंत्रिपरिषद का अधिकतम आकार स्वतः बढ़कर 122 हो जाएगा। इतनी बड़ी मंत्रिपरिषद न केवल प्रशासनिक मशीनरी को भारी-भरकम, असंगठित और बोझिल (Unwieldy) बनाएगी, बल्कि यह सार्वजनिक खजाने पर भारी वित्तीय दबाव भी डालेगी। नीति निर्माण की चपलता भी इससे प्रभावित होगी। इसके विपरीत, दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में संघीय कैबिनेट में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के अलावा केवल 22 कार्यकारी विभागों के प्रमुख होते हैं, जो यह दर्शाता है कि प्रभावी प्रशासन के लिए विशाल कैबिनेट की आवश्यकता नहीं होती।

चौथा व्यावहारिक परिवर्तन संसद सदस्यों की विधायी भागीदारी (Opportunities for MPs to participate) में भारी कमी के रूप में सामने आएगा। एक बहुत बड़े सदन (850 सांसदों) का सीधा अर्थ यह है कि संसद के सीमित कार्य-दिवसों में प्रत्येक सांसद को संसदीय बहस, विधेयकों पर चर्चा, और महत्वपूर्ण नीतिगत हस्तक्षेप के लिए बहुत कम समय मिलेगा। कुछ विधायी उपकरण जैसे प्रश्नकाल (Question Hour) और सार्वजनिक महत्व के मामले उठाने के अवसर बैलेट (लॉटरी) के माध्यम से आवंटित किए जाते हैं। 850 सांसदों की उपस्थिति में, किसी भी सांसद के सवाल के बैलेट में चुने जाने की प्रायिकता (Probability) काफी कम हो जाएगी, जिससे सांसदों द्वारा अपने क्षेत्र की जनता के महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने की क्षमता और संसदीय जवाबदेही बुरी तरह प्रभावित होगी।

बदलाव 3: राजकोषीय संघवाद और वित्त आयोग पर दबाव

परिसीमन का सबसे सीधा, तीखा और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे—अर्थात् राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism)—पर पड़ेगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 280 वित्त आयोग (Finance Commission) की स्थापना का प्रावधान करता है, जिसका मुख्य कार्य यह सिफारिश करना है कि केंद्र द्वारा एकत्र किए गए विभाज्य पूल (Divisible Pool) के करों को केंद्र और राज्यों के बीच (Vertical Devolution) और फिर विभिन्न राज्यों के बीच (Horizontal Devolution) कैसे बांटा जाए।


भारत का राजकोषीय संघवाद इस समय गहरे तनाव से गुजर रहा है। दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक, केरल) का दृढ़ तर्क है कि वे भारत के आर्थिक विकास का इंजन हैं और केंद्र को भारी कर राजस्व (विशेष रूप से प्रत्यक्ष कर और जीएसटी) का योगदान देते हैं। लेकिन वित्त आयोग के फॉर्मूले में समानता (Equity) लाने के लिए जनसंख्या (Population) और आय असमानता (Income Distance) का बड़ा वेटेज होता है, जिसके कारण इन समृद्ध राज्यों को उनके द्वारा दिए गए कर के अनुपात में केंद्र से बहुत कम पैसा वापस मिलता है।


परिसीमन के बाद जब लोकसभा में उत्तरी राज्यों का राजनीतिक वर्चस्व अत्यधिक बढ़ जाएगा, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि भविष्य के वित्त आयोगों पर जनसंख्या-आधारित हस्तांतरण (Population-based devolution) को और अधिक महत्व देने का भारी राजनीतिक दबाव पड़ेगा।


इस तनाव को हाल ही में गठित 16वें वित्त आयोग (2026-31 की अवधि के लिए) के विचारार्थ विषयों (Terms of Reference) और उसकी बहसों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। एक ओर 16वें वित्त आयोग ने 15वें वित्त आयोग की तरह ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण (Vertical Devolution) को 41% पर बरकरार रखा है (14वें वित्त आयोग में यह 42% था, जिसे जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 1% कम किया गया), वहीं क्षैतिज हस्तांतरण के मानदंडों में सूक्ष्म परिवर्तन किए गए हैं। दक्षिणी और औद्योगीकृत राज्यों को शांत करने के एक प्रयास के रूप में, 16वें वित्त आयोग ने पुराने कर प्रयास (Tax Effort) मानदंड को हटाकर 'जीडीपी में योगदान' (Contribution to GDP) का एक नया मानदंड पेश किया है और इसे 10% वेटेज दिया है। हालाँकि, इसे 'स्क्वायर-रूट ट्रांसफॉर्मेशन' (Square-root transformation) फॉर्मूले के जरिए लागू किया गया है, जिसने अमीर राज्यों के लाभ को काफी हद तक सीमित कर दिया है। इसके साथ ही पुनर्वितरण मैट्रिक्स (Redistributive metrics) में 'आय दूरी' (Income Distance) के वेटेज को 45% से घटाकर 42.5% और 'क्षेत्रफल' (Area) को 15% से घटाकर 10% कर दिया गया है। जनसंख्या (17.5%), वन एवं पारिस्थितिकी (10%), और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (10%) का वेटेज बरकरार रखा गया है।

यह विश्लेषण इस तथ्य को रेखांकित करता है कि परिसीमन के कारण उत्तरी राज्यों की बढ़ती राजनीतिक शक्ति और दक्षिणी राज्यों की बढ़ती आर्थिक शक्ति के बीच एक सीधा और विस्फोटक टकराव पैदा होगा। यदि करों के बंटवारे में उत्तर भारत को अधिक हिस्सा दिया जाता है, तो दक्षिण भारत में अलगाव या संघ के खिलाफ गहरी नाराजगी की भावना पैदा हो सकती है। राज्य सरकारों का राजकोषीय स्थान (Fiscal Space) पहले ही बहुत सिकुड़ चुका है। जीएसटी (GST) लागू होने के बाद राज्यों ने अपनी कराधान स्वायत्तता खो दी है। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने उपकर (Cesses) और अधिभार (Surcharges) का अत्यधिक उपयोग करना शुरू कर दिया है। चूंकि उपकर और अधिभार संविधान के अनुच्छेद 270 के तहत विभाज्य पूल (Divisible pool) का हिस्सा नहीं होते हैं, इसलिए केंद्र उन्हें राज्यों के साथ साझा करने के लिए बाध्य नहीं है। वर्तमान में सकल कर राजस्व में इनकी हिस्सेदारी 15% से अधिक हो गई है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि राज्यों को मिलने वाला वास्तविक धन 41% के वैधानिक वादे से बहुत कम है। परिसीमन इस राजकोषीय तनाव को चरम पर ले जाएगा, क्योंकि राजनीतिक शक्ति खोने वाले राज्य आर्थिक मोर्चे पर अधिक आक्रामक मांगें करेंगे।

बदलाव 4: राज्यों के भीतर की गतिशीलता - शहरीकरण और आरक्षित सीटें (Intra-State Dynamics)

परिसीमन की परिचर्चा अक्सर राज्यों के बीच (Inter-state) सीटों के बँटवारे पर केंद्रित रहती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि परिसीमन का एक उतना ही गहरा प्रभाव राज्यों के भीतर (Intra-state) निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पूरी तरह से नया आकार देने में होता है। इसके तहत राज्य विधानसभाओं (अनुच्छेद 170) की कुल सीटों की संख्या और भौगोलिक सीमाओं का भी व्यापक पुनर्निर्धारण होगा।

क) ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर शक्ति का स्थानांतरण (Rural to Urban Shift)

1971 के बाद से भारत में भारी औद्योगीकरण, शहरीकरण और ग्रामीण-से-शहरी प्रवास (Rural to Urban Migration) हुआ है। सीटों और सीमाओं के फ्रीज होने के कारण, वर्तमान में महानगरों और शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बहुत अधिक (Disproportionately high) हो गई है।


गुजरात के सूरत शहर का उदाहरण इस आंतरिक कु-विभाजन (Internal malapportionment) को बहुत स्पष्ट रूप से दर्शाता है। 2011 की आधिकारिक जनगणना के अनुसार, सूरत शहर की शहरी आबादी 48,49,213 थी, जो पूरे गुजरात राज्य की कुल आबादी (6,04,39,692) का 8.02% थी। सूरत जिले की कुल शहरी आबादी का 92% हिस्सा अकेले सूरत शहर में निवास करता है। वर्तमान परिसीमन के तहत, यह विशाल आबादी सूरत की 9 विधानसभा क्षेत्रों (सूरत ईस्ट, सूरत नॉर्थ, वराछा रोड, करंज, लिंबायत, उधना, मजूरा, कतारगाम और सूरत वेस्ट) में फैली हुई है। 182-सदस्यीय गुजरात विधानसभा में, इतनी विशाल (8% से अधिक) आबादी वाले इस शहरी क्षेत्र का राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल 5% (9 सीटें) है।

जब नया परिसीमन लागू होगा और सीमाओं को नए सिरे से खींचा जाएगा, तो सूरत, मुंबई, बेंगलुरु, दिल्ली, पुणे और हैदराबाद जैसे महानगरों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में बहुत अधिक विधानसभा और लोकसभा सीटें मिलेंगी। इसके विपरीत, सुदूर ग्रामीण और कृषि बहुल क्षेत्रों (Hinterlands) का राजनीतिक प्रभाव नाटकीय रूप से कम हो जाएगा। इसका सीधा असर राष्ट्रीय और राज्य स्तर की आर्थिक प्राथमिकताओं पर पड़ेगा। नीतियां—जो ऐतिहासिक रूप से कृषि ऋण माफी, उर्वरक सब्सिडी और ग्रामीण मतदाताओं पर केंद्रित रहती हैं—वे भविष्य में शहरी बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक परिवहन, सेवा क्षेत्र के विकास और मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं की ओर तेजी से मुड़ सकती हैं।

ख) अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में बदलाव

परिसीमन का एक और 'छिपा हुआ परिणाम' (Hidden consequence) अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की कुल संख्या और उनकी भौगोलिक अवस्थिति में होने वाला बदलाव है। संविधान के अनुच्छेद 330 (लोकसभा) और 332 (विधानसभा) के तहत यह आरक्षण किसी राज्य की कुल जनसंख्या में SC और ST समुदाय की जनसंख्या के अनुपात में दिया जाता है।


मिलन वैष्णव और जेमी हिंटसन के गहन जनसांख्यिकीय अध्ययन के अनुसार, भविष्य के परिसीमन के परिणामस्वरूप लोकसभा में कम से कम 18 आरक्षित सीटों की स्थिति में बदलाव आएगा। यहाँ भी उत्तर और दक्षिण के बीच एक स्पष्ट क्षेत्रीय बदलाव (Regional shift) देखा जाएगा: धीमी गति से बढ़ने वाले दक्षिणी राज्य अपनी SC/ST आरक्षित सीटें खो देंगे, जबकि तेजी से बढ़ने वाले उत्तरी राज्यों में इन समुदायों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।


इसके अतिरिक्त, राज्य के भीतर भी आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदल जाएंगी। परिसीमन आयोग स्थानीय जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर यह तय करेगा कि कौन सी सीटें आरक्षित होंगी। इससे कई ऐसी मौजूदा आरक्षित सीटें सामान्य हो सकती हैं, जो दशकों से आरक्षित हैं, और कई वर्तमान सामान्य सीटें आरक्षित घोषित हो सकती हैं। यह रोटेशन स्थानीय राजनीतिक समीकरणों (Local political dynamics), स्थापित राजनेताओं के करियर और पार्टियों के मजबूत गढ़ों (Strongholds) को पूरी तरह से पलट देगा।

ग) महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का तत्काल कार्यान्वयन

106वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2023, जिसे 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के रूप में जाना जाता है, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का ऐतिहासिक प्रावधान करता है। हालाँकि, संविधान में एक विशिष्ट शर्त (अनुच्छेद 334A) जोड़ी गई थी कि यह महिला आरक्षण अगले परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही प्रभावी होगा।

परिसीमन विधेयक के पारित होने और परिसीमन आयोग द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया पूर्ण होने से यह बाधा समाप्त हो जाएगी और 33% महिला आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएगा।

यह भारत के चुनावी परिदृश्य और राजनीतिक संस्कृति को जड़ से बदल देगा। परिसीमन आयोग को यह भी तय करना होगा कि कौन सी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, और यह आरक्षण रोटेशन (Rotation) के आधार पर हर परिसीमन के बाद बदलता रहेगा।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: अमेरिकी संघवाद का अनुभव

भारत में प्रतिनिधित्व और परिसीमन के इस आसन्न संकट को व्यापक संदर्भ में समझने के लिए, वैश्विक लोकतांत्रिक प्रणालियों से तुलना करना अत्यंत प्रासंगिक है। इस संदर्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका का संघीय मॉडल एक महत्वपूर्ण केस स्टडी प्रस्तुत करता है।


अमेरिका की संघीय विधायिका के निचले सदन (House of Representatives, जो भारत की लोकसभा के समकक्ष है) में सीटों की कुल संख्या 1913 से 435 पर स्थायी रूप से स्थिर (Capped) कर दी गई है। 1911 में अमेरिका की कुल जनसंख्या केवल 9.4 करोड़ थी, जो 2023 तक बढ़कर लगभग 33.4 करोड़ हो चुकी है (अर्थात लगभग चार गुना वृद्धि)। इसके बावजूद, उन्होंने सदन के आकार को नहीं बढ़ाया है।


अमेरिका में हर 10 साल की जनगणना के बाद, इन 435 सीटों का विभिन्न राज्यों के बीच पुनर्वितरण (Re-apportionment) "समान अनुपात की विधि" (Method of equal proportion) का उपयोग करके किया जाता है। इस पारदर्शी और गणितीय विधि में, 50 राज्यों में से प्रत्येक को पहले 1-1 सीट गारंटी के तौर पर आवंटित की जाती है। शेष 385 सीटों को एक जटिल गणितीय फॉर्मूले के आधार पर राज्यों को उनकी बदलती जनसंख्या के अनुसार बांटा जाता है। यह प्रक्रिया इतनी सुचारू है कि इससे किसी भी राज्य को भारी राजनीतिक नुकसान नहीं होता। उदाहरण के लिए, 2021 की नवीनतम अमेरिकी जनगणना के बाद किए गए पुनर्वितरण में, 37 राज्यों की सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ। टेक्सास (जिसकी जनसंख्या तेजी से बढ़ी) को 2 अतिरिक्त सीटें मिलीं, 5 अन्य राज्यों को 1-1 सीट मिली, और 7 राज्यों (जिनकी जनसंख्या वृद्धि धीमी रही) को केवल 1-1 सीट गंवानी पड़ी।

भारत की समस्या की जड़ यह है कि यहाँ विभिन्न राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि की दरों में अंतर (Differential growth rates) इतना विशाल और क्षेत्रीय रूप से केंद्रित है कि अमेरिका की तरह बिना कुल सीटें बढ़ाए पुनर्वितरण करने पर एक अभूतपूर्व संकट खड़ा हो जाएगा। यदि भारत में लोकसभा की सीटें 543 ही रखी जाती हैं, तो दक्षिण भारतीय राज्यों को एक या दो नहीं, बल्कि एक दर्जन से अधिक सीटों का सामूहिक नुकसान उठाना पड़ेगा। भारत की अनूठी भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक विविधता को देखते हुए, यह एक संघीय दुःस्वप्न (Federal nightmare) पैदा कर देगा। राजनीति विज्ञान के 'सैमुअल स्नाइडर इंडेक्स' (Samuel Snyder Index) के अनुसार, जो कु-विभाजन को मापता है, भारत के निचले सदन में कु-विभाजन का समग्र स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों से बहुत चरम नहीं है (लगभग 8% या 44 सीटें गलत तरीके से आवंटित हैं), लेकिन इसका राजनीतिक परिणाम इसलिए अत्यधिक विनाशकारी है क्योंकि यह विभाजन पूरे देश में समान रूप से नहीं, बल्कि भौगोलिक और क्षेत्रीय आधार (उत्तर बनाम दक्षिण) पर अत्यधिक संकेंद्रित (Concentrated) है।

संभावित नीतिगत समाधान और संघीय सुधार (Way Forward & Federal Reforms)

परिसीमन की आवश्यकता असंदिग्ध है क्योंकि किसी भी जीवंत लोकतंत्र में मतदान समानता (Voter parity) के सिद्धांत को अनिश्चित काल तक टाला या खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन भारत की विविधता को देखते हुए, इसे सफलतापूर्वक लागू करने के लिए एक 'ग्रैंड बार्गेन' (Grand Bargain) या व्यापक संघीय समझौते की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों, राजनीति विज्ञानियों और नीति-निर्माताओं द्वारा इस आसन्न संकट को टालने के लिए निम्नलिखित ढांचागत समाधान प्रस्तावित किए जा सकते हैं:

राज्यसभा का संरचनात्मक सुधार (Rajya Sabha Reforms): चूंकि परिसीमन के बाद लोकसभा में विशुद्ध रूप से जनसंख्या के आधार पर उत्तरी राज्यों को भारी राजनीतिक शक्ति मिलेगी, इसलिए संघीय संतुलन बनाए रखने के लिए राज्यसभा में आमूल-चूल सुधार किया जाना चाहिए। वर्तमान में राज्यसभा में भी सीटें जनसंख्या के आधार पर ही बांटी जाती हैं। इसे अमेरिका की सीनेट (US Senate) की तर्ज पर बदला जा सकता है, जहाँ प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व (Equal representation) मिलता है, चाहे उसकी जनसंख्या कितनी भी हो। या फिर, एक ऐसा मिश्रित फॉर्मूला लागू किया जा सकता है जहाँ प्रत्येक राज्य को कम से कम 5 सीटें तय हों और शेष सीटें जनसंख्या के विशिष्ट बैंड (Population bands) (जैसे 1-3 करोड़ के लिए 1 सीट, 3-5 करोड़ के लिए 2 सीटें) के आधार पर दी जाएं। इस व्यवस्था से सभी भौगोलिक जोन्स (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) का प्रतिनिधित्व लगभग 23% से 26% के बीच संतुलित हो जाएगा और कोई एक क्षेत्र राज्यसभा पर हावी नहीं हो सकेगा।

शक्तियों और निधियों का विकेंद्रीकरण (Decentralisation of Powers): दक्षिणी राज्यों की उन वैध चिंताओं को दूर करने के लिए कि उनके ऊपर उत्तर भारत की नीतियां थोपी जाएंगी, संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में संशोधन किया जा सकता है। इसके माध्यम से संघ सूची (Union List) से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कुछ आर्थिक पहलुओं से संबंधित महत्वपूर्ण शक्तियों को राज्य सूची (State List) या समवर्ती सूची (Concurrent List) में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। इससे राज्यों को अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार नीतियां बनाने की अधिक स्वायत्तता मिलेगी और केंद्र सरकार का अति-केंद्रीकृत नियंत्रण कम होगा। जब राज्यों के पास अधिक अधिकार होंगे, तो लोकसभा में कम सीटों का डर (Loss of seats) कुछ हद तक बेअसर हो जाएगा।

राजकोषीय नीतियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व से पृथक्करण (Fiscal Decoupling): वित्त आयोग को यह सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य किया जाना चाहिए कि करों के हस्तांतरण में जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (Demographic performance), मानव विकास सूचकांक, और जीडीपी में योगदान को जनसंख्या (Population) से अधिक या कम से कम उसके बराबर महत्व दिया जाए। यदि दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों को यह संस्थागत आश्वासन दिया जाए कि उनकी राजनीतिक शक्ति कम होने पर भी उन्हें आर्थिक रूप से दंडित नहीं किया जाएगा, तो परिसीमन का राजनीतिक विरोध काफी कम हो सकता है। इसके अतिरिक्त, केंद्र द्वारा लगाए जाने वाले उपकर (Cesses) और अधिभार (Surcharges) को सकल कर राजस्व के 8-10% पर सीमित करना और उनके एक हिस्से को डिविजिबल पूल (Divisible pool) का अनिवार्य हिस्सा बनाना राजकोषीय संघवाद को मजबूत करने के लिए एक अत्यंत आवश्यक कदम है।

लोकसभा का आनुपातिक विस्तार (Proportional Expansion of Lok Sabha): जैसा कि 131वें संशोधन विधेयक में प्रस्तावित था और जिसे कई शिक्षाविदों ने समर्थित किया है, लोकसभा की सीटें 848 या 850 तक बढ़ा दी जाएं, ताकि 2001 की स्थिति के अनुसार किसी भी राज्य की कुल सीटों (Absolute count) की संख्या कम न हो। यद्यपि इससे सापेक्ष शक्ति (Relative power) फिर भी बदलेगी, लेकिन किसी राज्य की मौजूदा सीटों में पूर्ण कटौती न होना राजनीतिक रूप से इसे स्वीकार्य बनाने का एक व्यावहारिक तरीका (Pragmatic approach) हो सकता है।

निष्कर्ष

परिसीमन विधेयक और 131वां संविधान संशोधन, जब भी अपने पूर्ण स्वरूप में पारित होगा, वह आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे परिवर्तनकारी और युगांतरकारी संवैधानिक घटनाओं में से एक होगा। इस एक कदम के लागू होने से भारत के शासन तंत्र में बहुत कुछ बुनियादी रूप से बदल जाएगा—लोकसभा का आकार एक तिहाई से अधिक बड़ा हो जाएगा, दशकों से लंबित महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) एक वैधानिक हकीकत बन जाएगा, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रीय नीतियों के भीतर ग्रामीण इलाकों से राजनीतिक सत्ता खिसककर महानगरों और तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों में आ जाएगी, और अनुसूचित जाति/जनजाति के आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का भौगोलिक नक्शा पूरी तरह से पलट जाएगा।

लेकिन इन सभी तकनीकी, सांख्यिकीय और ढांचागत परिवर्तनों से बहुत परे, परिसीमन की यह प्रक्रिया भारतीय गणतंत्र के सामने सबसे गहरा और अस्तित्वगत (Existential) प्रश्न खड़ा करेगी: "क्या भारत का संघीय ढांचा, इसके संवैधानिक संस्थान और इसकी राजनीतिक संस्कृति इतनी लचीली (Resilient) है कि वह जनसांख्यिकीय रूप से भारी और राजनीतिक रूप से हावी उत्तर भारत, तथा आर्थिक रूप से अत्यंत उन्नत, विकास के पैमानों पर अग्रणी लेकिन राजनीतिक रूप से हाशिए पर जाते दक्षिण भारत के बीच के तीखे अंतर्विरोधों को साध सके?"।

एक ओर, परिसीमन लोकतंत्र की उस मूल भावना—समान और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व—के लिए अपरिहार्य है, जिस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। एक जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र लंबे समय तक यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसके एक राज्य के नागरिक के वोट की राजनीतिक कीमत, दूसरे राज्य के नागरिक के वोट की कीमत से दोगुनी या तिगुनी हो।

दूसरी ओर, इस लोकतांत्रिक संतुलन को बहाल करते समय, भारत को अपने उन राज्यों को अलग-थलग या हतोत्साहित करने से हर हाल में बचना होगा जिन्होंने दशकों तक राष्ट्रीय विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और परिवार नियोजन के कठिन लक्ष्यों को प्राप्त करने में अग्रणी और अनुकरणीय भूमिका निभाई है। अंततः, भविष्य का परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को मानचित्र पर फिर से खींचने की एक नीरस गणितीय कवायद नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक, आर्थिक और संघीय अनुबंध (Federal Compact) को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप फिर से परिभाषित करने का एक ऐतिहासिक अवसर—और साथ ही इसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती—है। इस चुनौती से पार पाने के लिए सूक्ष्म राज्य कौशल (Statecraft) और राजनीतिक परिपक्वता की आवश्यकता होगी।

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